The question is often asked,"Is South China Sea likely to
In response, many analysts who compare the current situation in the South China Sea region with the developments just before the World War I and point out that that it is a tinderbox and it mirrors the drift to the war in 1914. Then the world thought a war was unthinkable but when Germany, then a rising power challenged Great Britain than a well-established world power, a series of events took place building alliances and counter alliances that ultimately resulted in the WWI beginning with the murder of one person.
The recent statement by Donald Trump’s nominee for Secretary of State, Rex Tillerson in his confirmation hearing that ‘the US is going to have to send China a clear signal that, first, the island building should stop and second, its access to those islands would not be allowed’ has strengthened the assessment that the South China Sea is not only a flash point but a conflict has now become a distinct possibility.
Trump’s call to the Taiwanese president too reflected that the US would put greater pressure on China. The Chinese are unlikely to back down. China which considers the South China Sea region as valuable as Taiwan and Tibet feel that its legitimacy is being challenged. It has not only been claiming almost the entire region on the basis of its version of history but it has also rejected the Permanent Court of Arbitration’s ruling, which found that the Chinese activities were in violation of the international law. The Chinese scant regard for international law and world organs has come out clearly from its action.
अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने की साउथ चाइना सी में चीन की 'मनमानी' की निंदा की !अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने साउथ चाइना सी के सैन्यीकरण और वहां आइलैंड बनाने के लिए चीन की कड़ी आलोचना की है। दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के रुख से उलट इन तीन देशों ने चीन के प्रति सख्त रवैया अपनाते हुए कहा है कि साउथ चाइना सी में आचार संहिता कानूनी रूप से बाध्यकारी होनी चाहिए। तीनों देशों ने चीन द्वारा साउथ चाइना सी में विशालकाय आर्टिफिशल आइलैंड्स बनाने का विरोध किया है। उन्होंने आशंका जताई है कि इन आइलैंड्स का इस्तेमाल मिलिटरी बेस के रूप में किया जा सकता है और इसके जरिए चीन की मंशा यहां अपना वर्चस्व स्थापित करने की हो सकती है।
चीन हमेशा से कहता रहा है कि पड़ोसी देशों के साथ उसके विवाद पूरी तरह द्विपक्षीय हैं और अन्य देशों को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। सोमवार को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा था कि 'बाहरी पक्षों' द्वारा किसी भी तरह की दखलंदाजी यहां आचार संहिता को लेकर हो रही बातचीत को खतरे में डाल सकती है।
साउथ चाइना सी के लगभग पूरे इलाके पर चीन अपना दावा जताता है। इसके जरिए सालना 5 ट्रिलियन डॉलर का कारोबार होता है और वहां तेल और गैस के बड़े भंडार होने की बात कही जाती है। चीन के इस दावे को लेकर उसका वियतनाम, फिलीपीन्स, मलयेशिया, ब्रुनेई सहित आसियान के सभी 10 सदस्य देशों और ताइवान के साथ भी विवाद है। हालांकि हाल के वर्षों में चीन ने इनमें से कुछ देशों पर अलग-अलग तरीकों से दबाव बनाकर, पड़ोसी देशों की क्षेत्रीय ताकत को कमजोर करने का काम किया है।
इस सिलसिले में चीन को सोमवार को बड़ी कामयाबी उस वक्त हाथ लगी जब मनीला में आसियान देशों की बैठक में इस विवाद को लेकर चीन की शर्तों को एक तरह से स्वीकार करते हुए बयान जारी किया गया। चीन इस बात पर जोर देता रहा है कि साउथ चाइना सी में उसके और आसियान देशों के बीच काफी वक्त से लंबित आचार संहिता पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं होनी चाहिए। चीन की इस मांग को सभी दक्षिणपूर्व एशियाई देशों ने बिना विरोध स्वीकार किया है।
हालांकि अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने एक संयुक्त बयान जारी कर स्पष्ट रूप से चीन की इस मुद्दे लेकर कड़ी आलोचना की है। बयान में कहा गया है, 'साउथ चाइना सी में जमीन पर दावा, आउटपोस्ट्स के निर्माण, विवादित इलाकों के सैन्यीकरण को लेकर किसी भी तरह की आचार संहिता कानूनी रूप से बाध्यकारी, सार्थक और प्रभावी होनी चाहिए।' तीनों देशों ने चीन और फिलीपींस ने अपील की है कि उन्हें पिछले साल अंतरराष्ट्रीय पंचाट द्वारा दिए गए फैसले का आदर करना चाहिए जिसमें चीन के दावों को काफी हद तक खारिज कर दिया गया था।
गौरतलब है कि पहले फिलीपींस इस मुद्दे पर चीन के खिलाफ खुलकर अपनी बात कहता था और संयुक्त राष्ट्र समर्थित अंतरराष्ट्रीय ट्राइब्यूनल में इस मुद्दे को ले जाने वाला फिलीपींस ही था, लेकिन पिछले साल राष्ट्रपति पद पर रॉड्रिगो दुतेर्ते की नियुक्ति के बाद फिलीपींस के स्टैंड में नाटकीय बदलाव आया है। फिलीपींस ने चीन के साथ संबंध सुधारने के तहत इस फैसले को चीन के पक्ष में पेश करने की कोशिश की है। इसके पीछे फिलीपींस की मंशा चीन से करोड़ों डॉलर्स की मदद हासिल करना है।
चीन के आलोचक यह आरोप लगा रहे हैं कि चीन आसियान देशों को बांटने की कोशिश कर रहा है। वियतनाम की यह कोशिश जरूर थी कि मनीला में जारी किए गए बयान में चीन के खिलाफ सख्त भाषा का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन चीन के प्रति फिलीपींस की बदली नीति के चलते वियतनाम अलग-थलग पड़ गया।